Saturday, July 20, 2024

बिहार का राजनैतिक चित्रण : कुमार पवन

 आप गंगा के घाट पर इस स्थिति में हैं, जिसमें आपका एक पैर नदी के  अरार  पर और दूसरा पैर नदी के दलदल में है। लोग गहरे पानी में न चल जाएं उससे बचाव के लिए बांस की घेराबंदी की गई है। आप एक पैर अरार पर रखे हुए बंस को थामे खड़े हैं। बांस में  बहुत लोच है क्योंकि बहुत बजन पड़ रहा है। बांस छोड़ नहीं पा रहे हैं और अरार के पैर को इतनी मजबूती मिल नहीं पा रही है कि खुद को उबार सकें और न ही ये हो रहा है कि बांस और अरार के पैर उखड़ जाएं और हम डूब जाएं। बड़ी असमंजस की स्थिति है और ऐसा ही जीवन कट रहा है।

जिस बांस को पकड़े हैं उसपर भरोसा है भी और डर भी है कि का पता कब छूटे और हम धड़ाम से गिरें। ये गंगा का किनारा है कभी तो धारा शांत रहती है कभी उफान आती है, कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि कोई भारी चीज़ पैर में आ फंसी है। डरती हुई आँखें देखती है तो वो कोई शब होता है। हृदय व्याकुल होता है। जिया डेरा जाता है । फिर से हनुमान चालीसा पढ़ते हैं और सांसें गिन-गिन के काट रहे हैं।

ऐसे में कोई नई बांस दे रहा है ऊपर से। ये बांस हरी हरी लगती है। क्या करें उलझन है। सूखे बांस को छोड़ के नया वाला पकड़ें या जैसे हैं वैसे ही हनुमान चालीसा पढ़ते रहें । पुरानी वाली लोच खा के भी टाने हुए है, कइयों को छोड़ भी चुका है जिनके शब पैरों से लग रहे थे। डर भी लगता है कि कहीं छोड़ने पकड़ने में ऐसा न हो कि बैलेंस खराब हो और हम ससर के गंगा माई को पियरी के जगह खुद को चढ़ा दे जाएं।

खड़े-खड़े सोच रहे थे कि ये बूढ़ा बांस भी हरा ही आया था एक दिन और इसको पकड़ने के लिए भी जोखिम लेना पड़ा था। फिर बांस को धूप - वर्षा लगती गई, पक गया, अब सुख गया है। जब पिछले को छोड़ के रिस्क लेके इसको पकड़े थे तो यही लगता था कि शायद ये दूसरे पैर को ऊपर खींच पाएगा और जहां से इसके मालिक बांस लगा रहे हैं अपने पास तक ले आएंगे हमारी भी जिंदगी बच पाएंगी, पर कहां ऐसा हो पाया है, बांस बदल गया पर हम उसी अर्ध दलदली स्थिति में रह गए।

अब नया बांस आया है, क्या करें पकड़ें या पुराने भरोसे की तरह टूट जाएगा ये सोंच कर छोड़ दे जाएं। क्या करें? हम जनता हैं बांस बाले जनार्दन कहते हैं सोचते हैं जनार्दन रहे होते तो ऐसे दलदल में होते, गाली लगती है जनार्दन शब्द खुद के लिए। डर लगता है कि कहीं ऐसा न हो कि ये नया बांस मिडिल स्कूल बाले मास्टर साहब वाली कनैली न निकले जो 5-10 पीठ पर पटकाने के खराब चर्मरा जाती थी। क्या पता देखने में तो मजबूत लगती है पर क्या पता वजन संभाल पायेगी या बूढ़े से भी कामजोर साबित होगी।

खैर ये बात तो तय है कि रिस्क तो पिछली बार भी लिया था। हिम्मत और दम रखना तो आदत ही बन गई। एक मन करता है कि छोड़-छाड़ के साथ कूद जाएं जय गंगा मैया की ,बोल के । दूसरा कहता है कि कहीं ऐसा भी हो सकता है कि गंगा के नीचे कोई बांस मिले जो शिव जी का कंधा हो।

असमंजस तो है ही, स्थिति से संतुष्ट हैं नहीं तो मन कर रहा है कि ले लें जोखिम। क्योंकि केतनो कामजोर बांस रहेगा तो चौठारी तक मड़वा तान लेगा और वियाह के नेग पूरा हो जाएगा। ऐसे भी तो मरेंगे ऐसे ही मरेंगे। और कहीं शिव जी का कंधा निकल गया गलती से तो बाल बच्चे को आशीर्वाद प्राप्त हो जाएगा।

जय गंगा मैया। जय भोलेनाथ।

२० जुलाई २०२४

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