Wednesday, April 22, 2020

निद्रालोप

नजरे बेचैन होती हैं
शिकायत दिल से करती हैं
दिल कसमें गिनता है
ये नजरें भींग जाती हैं
आंसू गिरते हैं उनसे
ये दिल को भी भींगाते हैं
ये दिल फिर भी धड़कता है
चाहत उनकी करता है
अचानक बीच उनकी 
ये दिमाग है आ जाता 
ये दोनों को एक एक करके 
बेवकूफ है कहता 
वो दोनों करते हैं ऐसे 
की जैसे बच्चे हों माँ के 
ये मष्तिष्क बाज ना आता है 
जोरों का थप्पड़ जड़ता है 
नजरें घूरती हैं दिल को 
ये दिल भी घूरता है उसको 
फिर दिमाग भी उनको, अपनी करुणा दिखाता है 
दोनों को एक ही साथ अपनी बाहों में भरता है 
फिर तीनों के लफ्जों से 
ये सुर एक साथ निकलता है 
की जिंदगी हैं मिली हमको 
तो इसको जाया ना करना है 
कीचड़ को भी भर-भरके
मटमैली काग़ज़ों पर ही 
 अपना भाग्य है लिखना 
अपना भाग्य है लिखना 


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